हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी (र) ने कूफ़ा और शाम में अहलेबैत (अ) के ख़ुत्बों के अलग-अलग प्रभाव की व्याख्या करते हुए समाज की परिस्थितियों, लोगों की जागरूकता और प्रत्येक क्षेत्र के सामाजिक वातावरण की भूमिका पर प्रकाश डाला।
प्रश्न: शाम में इमाम सज्जाद (अ) का केवल एक ख़ुत्बा इतना प्रभावशाली कैसे हुआ, जबकि कूफ़ा में इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों के अनेक ख़ुत्बो का वैसा प्रभाव दिखाई नहीं दिया?
आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी (र) का उत्तर

पहला बिंदु
सबसे पहले यह समझना चाहिए कि जब किसी समाज में कोई मजबूत मूल्य-आधारित संस्कृति स्थापित होती है, तब भी उस समाज के सभी लोग उस संस्कृति से समान रूप से प्रभावित नहीं होते।
जो लोग वर्षों तक पैग़म्बर मुहम्मद (स) की प्रत्यक्ष शिक्षा और प्रशिक्षण में रहे—कुछ पूरे तेईस वर्ष और कुछ कम समय तक—वे भी ईमान, ज्ञान और धार्मिक मूल्यों के पालन के स्तर में एक जैसे नहीं थे।
जो लोग ईमान की सबसे ऊंचे दर्जो तक पहुँचे थे, उनकी संख्या बहुत कम थी। दूसरी ओर, जो लोग इस्लाम के कट्टर विरोधी थे और उसके विरुद्ध हर प्रकार का बलिदान देने को तैयार थे, वे भी बहुत कम थे। अधिकांश लोग इन दोनों समूहों के बीच थे और उनके भी अनेक स्तर थे।
दूसरा बिंदु: समाज और नेतृत्व का संबंध
किसी समाज का अपने नेताओं के साथ कैसा संबंध होगा और लोग किस सीमा तक उनका समर्थन या विरोध करेंगे, यह उनकी बौद्धिक, नैतिक और धार्मिक परिपक्वता पर निर्भर करता है।
यदि किसी समाज के अधिकांश लोग नैतिक और धार्मिक दृष्टि से कमज़ोर हों और उनके शासक भी उन्हीं जैसे हों, तो ऐसे समाज में सामान्यतः जनता और शासन के बीच टकराव कम होता है।
तीसरा बिंदु: असाधारण परिस्थितियाँ और विशिष्ट लोगों की परीक्षा
कभी-कभी किसी समाज में ऐसी कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि बड़े-बड़े विद्वान, प्रभावशाली व्यक्ति और समाज के अग्रणी लोग भी डगमगा जाते हैं।
ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए वे पहले से तैयार नहीं होते। उनमें से कुछ यह समझ ही नहीं पाते कि उन्हें क्या करना चाहिए, जबकि कुछ अपने निजी हितों और सुरक्षा के कारण चुप्पी साध लेते हैं।
इन तीन बातों को ध्यान में रखने के बाद इस प्रश्न का उत्तर समझना आसान होगा।
कूफ़ा के लोगों की स्थिति
कूफ़ा में निस्संदेह ऐसे लोग मौजूद थे जिन्होंने अमीरुल मोमेनीन इमाम अली (अ) के निकट रहकर उनकी शिक्षाओं और जीवनचर्या से गहरा प्रभाव ग्रहण किया था और ईमान की ऊँची मंज़िलें प्राप्त की थीं।
इनमें से श्रेष्ठ लोग कर्बला में इमाम हुसैन (अ) के साथ आकर शहीद हुए।
कुछ अन्य लोग भी उनके अनुयायी थे, लेकिन उनका ईमान और जागरूकता उस स्तर की नहीं थी। वे नेक और धर्मनिष्ठ लोग थे तथा बनी उमय्या को अहले बैत (अ) पर कभी प्राथमिकता नहीं देते थे।
लेकिन कूफ़ा में भय और दमन का वातावरण इतना कठोर था कि उनमें विरोध करने का साहस नहीं बचा था। अंततः उनके पास केवल दो ही रास्ते थे—या तो गुप्त रूप से शहर छोड़ दें या छिपकर जीवन बिताएँ।
विशेष रूप से हज़रत मुस्लिम (अ) की शहादत के बाद यह स्थिति और भी गंभीर हो गई थी।
ऐसे माहौल में यह अपेक्षा करना कि केवल एक-दो ख़ुत्बों या कुछ भाषणों से लोगों की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी, वास्तविकता के अनुरूप नहीं है।
शाम के लोगों की स्थिति
जब हम शाम की ओर देखते हैं, तो वहाँ के लोगों की स्थिति भिन्न थी।
वे स्वभाव से अहले बैत (अ) के शत्रु नहीं थे और न ही इस्लाम के विरोधी थे। उन्होंने इस्लाम की जानकारी बनी उमय्या के माध्यम से प्राप्त की थी और इसलिए उन्हें अपने शासकों से कोई विशेष शिकायत भी नहीं थी।
अधिकांश लोग सत्य की खोज में नहीं रहते थे, बल्कि अपने शासकों का अनुसरण करते थे।
फिर भी उनके भीतर मानव-स्वभाव की मूलभूत अच्छाइयाँ और सत्य को स्वीकार करने की क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
साथ ही वहाँ ऐसा कठोर दमनकारी वातावरण भी नहीं था जैसा कूफ़ा में था।
इसी कारण जब इमाम सज्जाद (अ) को ख़ुत्बा देने का अवसर मिला, तो लोगों के भीतर उसे स्वीकार करने की क्षमता मौजूद थी।
उनकी भटकन मुख्यतः अज्ञानता के कारण थी। जब इमाम के शब्दों ने उस अज्ञानता का पर्दा हटाया और उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ, तो उनकी स्वाभाविक सत्यप्रियता जाग उठी और वे गहराई से प्रभावित हुए।
निष्कर्ष: दोनों समाजों में प्रभाव का अंतर
कूफ़ा और शाम में अहले बैत (अ) के ख़ुत्बों के प्रभाव में जो अंतर दिखाई देता है, उसका कारण दोनों समाजों की ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों का भिन्न होना था।
शाम में लोगों की स्वाभाविक सत्यनिष्ठा और नैतिक चेतना पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी। उनकी सबसे बड़ी समस्या अज्ञानता थी, जिसे इमाम सज्जाद (अ) के ख़ुत्बे ने दूर कर दिया।
इसके विपरीत कूफ़ा में शासन के कठोर दमन, भय और निरंतर अत्याचार ने लोगों को इस प्रकार दबा दिया था कि वहाँ इस प्रकार की नसीहतें और मार्गदर्शन व्यापक प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सके, जबकि शाम में उनका अपेक्षाकृत अच्छा प्रभाव दिखाई दिया।
आपकी टिप्पणी